Wednesday, 3 June 2020

एहसास की ज़ुबाँ है शायरी


विभाष कुमार झा 

 शायरी पर यूं तो तमाम शायरों  ने एक से बढ़कर अशआर लिखे हैं. फिर भी कुछ अशआर का ज़िक्र किये बिना ये बात तफ्सील से बताना नामुमकिन है.

बक़ौल निदा फाज़िली-
"मिल के जो खो गया है ज़िन्दगी में 
ग़ज़ल है नाम उसका  शायरी में"

जां निसार अख़्तर कहते हैं-
हमसे पूछो  ग़ज़ल क्या, ग़ज़ल का फ़न क्या 
चंद लफ़्ज़ों  में जैसे कोई आग छुपा दी जाये    
 
और ये शेर तो अक्सर दोहराया जाता है, ग़ज़ल की  खूबसूरती और नज़ाक़त को बयान करने के लिए
फ़िक़्र मोमिन की, जुबां दाग़ की, ग़ालिब का बयां 
मीर का  रंग-ए- सुख़न हो तो ग़ज़ल होती है 
सिर्फ़ अल्फ़ाज़ ही मानी नहीं करते पैदा
जज़्बा-ए-ख़िदमत-ए-फ़न  हो तो ग़ज़ल होती है.

इसी तरह  शायरी के मुताल्लिक़ भी बहुत उम्दा अशआर कहे गए हैं

शक़ील बदायूँनी कहते हैं -

मैं शक़ील दिल का हूं तर्जुमां, कि मुहब्बतों का हूँ राज़दां    
 मुझे फ़ख़्र है  मिरी शायरी,  मिरी ज़िन्दगी से जुदा नहीं 

 बकौल जां निसार अख़्तर  शायरी को यूं समझा जा सकता है -

मेरा हर शे'र है अख़्तर मेरी ज़िंदा  तस्वीर 
देखने वालों ने हर लफ्ज़ में देखा है मुझे
  
इस ब्लॉग में हम ऐसे ही उम्दा और बेहतरीन अशआर पेश करने की ख्वाहिश रखते हैं, जो शायरी में नई-नई दिलचस्पी रखने  वालों को भी पसंद आएं.    उम्मीद करते हैं की पाठक भी इसमें अपने सुहाव देते रहेंगे, ताकि उनके सुझाव के आधार पर भी इस ब्लॉग को पढ़ने योग्य बनाया जा सके.  



    

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