Thursday, 4 June 2020

*कोरोना के दौर में पत्रकारिता -- खुद से कही गई कुछ बातें*


विभाष कुमार झा
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*न जाने कौन सा पल मौत की अमानत हो,
हर एक पल की ख़ुशी को गले लगा के जियो

न मुंह छुपा के जीयो,और न सर झुका के जीयो
ग़मों का दौर भी आये तो मुस्कुरा के जीयो*
साहिर लुधियानवी ने हमराज़ फिल्म के लिए अपने एक बेहद मकबूल गाने में ये पंक्तियाँ लिखी थी. आज कोरोना वायरस के रूप में अदृश्य मौत की आहट के बीच समाचार वाचन के काम को पूरी निष्ठा के साथ करते हुए मुझे ये पंक्तियाँ कितनी मौजूं मालूम पड़ रही हैं. वैसे तो देश और दुनिया भर के पत्रकार युद्ध, भूकंप, बाढ़, या फिर अन्य प्राकृतिक आपदा सहित आतंकवाद और माओवादी घटनाओं की रिपोर्टिंग करते समय अक्सर ही अपनी जान को जोखिम में डालने को विवश रहते हैं. ऐसा करते हुए बहुत से पत्रकारों को अपनी जान तक गंवानी पड़ती है. इस लिहाज से खतरों और चुनौतियों के बीच पत्रकारिता कोई नई या विशेष बात भी नहीं है. फिर भी इन दिनों कोरोना वायरस का जिस तरह से संक्रमण देश और दुनिया में फैला हुआ है और विशेषज्ञों के मुताबिक इस समय हमारे देश में इस महामारी का तीसरा चरण शुरू हो रहा है, तो ऐसी खतरनाक स्थिति में मीडिया का काम करना सभी के लिए चुनौती से कम नहीं है. पहले मैंने जिन खतरनाक स्थितियों का जिक्र किया है, उसमें तो खतरा अपने भौतिक रूप और परिमाण (मैग्नीट्यूड) में दिखाई दे रहा होता है, इसलिए उन खतरों से बचने के उपाय भी अपने स्तर पर तत्काल किये जा सकते हैं, लेकिन इस बार तो खतरा दिखाई ही नहीं दे रहा है. और यही बात इस खतरे को और भी खतरनाक बना देती है. देश भर मे 21 दिनों के सम्पूर्ण लॉक-डाउन की घोषणा के साथ ही बीते दो दिनों में समाचार वाचन के काम को करते हुए बीच-बीच में कोरोना के खतरे का भी एहसास होता रहता है. इससे बचने के लिए एहतियात के तौर पर हर थोड़ी देर में साबुन से हाथ धोने और फिर हाथ सहित मोबाइल फोन, पेन, पर्स या अन्य सामानों को सेनिटाइज करते रहने से वातावरण में कोरोना की उपस्थिति और आहट का भी अंदाजा होता रहता है. घर में सवा पांच साल की जुड़वां बेटियों के होने के कारण खतरे के साथ अतिरिक्त सावधानी भी बरतना लाजिमी है. लौटकर जब अपने सारे सामानों को फिर से सेनिटाइज करने के बाद अच्छी तरह से सारे कपडे धोकर नहाने का उपक्रम करना होता है, तो ऐसा लगता है, जैसे हम किसी दिवंगत के अंतिम संस्कार में शामिल होने के बाद घर आए हैं. सभी जानते हैं कि तब भी बिलकुल यही सब करना होता है. लेकिन मन के किसी कोने में यह विश्वास भी है कि सब ठीक होगा. कुछ मित्र अवसाद का जिक्र भी करते हैं, उनके लिए भी यही कहना है कि मुझे भी इस अवसाद का बहुत गहराई से अंदाजा है, लेकिन जब भी हम जीवन के प्रति सजग होंगे, तो अवसाद का यह अनुभव आएगा ही. इससे बचना असंभव है.
निदा फ़ाज़िली ने तो कहा ही है...
पहले भी जीते थे मगर, जब से मिली है जिंदगी
सीधी नहीं है, दूर तक उलझी हुई है ज़िन्दगी
मुझे आज प्रसिद्द गीतकार और कवि गोपालदास नीरज जी से अपनी करीब बाईस बरस पहले पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के रेस्ट हाउस में हुई लम्बी बातचीत की याद आ रही है. वे सुबह सुबह बस नहाकर बनियान पहने हुए अखबार पढ़ रहे थे. मैंने उनसे मिलते ही सबसे पहले, अपने पास मौजूद उनकी कविताओं की कुछ किताबों को दिखाया और उसमें से अपनी पसंद की कविताएँ उन्हें बताई, फिर उन्होंने सभी किताबों के पहले पन्ने पर आशीर्वचन के शब्दों के साथ अपने हस्ताक्षर कर दिए. मैंने पहला ही सवाल उनसे, बस बातचीत की शुरुआत के लिए यूं ही कर दिया था कि ”आपकी कविताओं में उदासी और वेदना बहुत विशेष रूप से उभरती है. ये अलग बात है कि आप ही अपनी कुछ कविताओं में हारे हुए लोगों के भीतर उत्साह भी जगाते हैं, जैसे
छिप-छिप अश्रु बहाने वालों, मोती व्यर्थ लुटाने वालों,
कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है.

फिर भी आपकी रचना ....” मेरी अधूरी बात को ही पकड़कर उन्होंने तत्काल अपनी बात रख दी, ये कहकर कि, उदासी की कविताएँ लिखने के बावजूद, ये समझ लो बरखुरदार कि इस उमर में भी, मै निराश कतई नहीं हू. मै बहुत आशावादी हूँ. फिर उन्होंने अपने कुछ दोहे सुनाये, जिनके तेवर, बाद में मुझे निदा फ़ाज़िली की किताब पढ़ते समय उनके कुछ दोहों की तरह ही लगे. इस पूरी मुलाकात पर तो फिर कभी लिखूंगा. लेकिन विदा लेने से पहले जो बात उन्होंने मुझे कही थी, वो आज के कोरोना वायरस के दौर में उत्पन्न अवसाद की स्थिति के लिए अपने आप में बहुत ही बेमिसाल है. और इस बात से ही नीरज जी की महानता प्रकट होती है. पापाजी कवि सम्मलेन में कविताएँ पढ़ते थे, तो उनके साथ जाते हुए मैं तो बचपन से ही नीरज जी फैन ही नहीं था, बल्कि यूं कहूँ कि एसी था (इस गंभीर एकालाप के बीच खुद को थोडा हल्का करने की गरज से ही मैंने ये दोनों शब्द लिखे हैं)... विदा के समय उनकी बात यूं थी कि “जो पेड़ थोड़े समय के लिए ठूँठ बनने को तैयार नहीं होते, उन्हें फिर अगले मौसम में नए पत्ते पाने का अधिकार और सौभाग्य भी नहीं मिलता.” आज के सन्दर्भ में मुझे यह बात बहुत ताकत दे रही है. मेरे लिखे पर संभव है कि बहुत से विद्वानों की असहमति सहित अपनी अलग राय हो सकती है, और वे हर लिहाज से सही भी होंगे. उन सबके प्रति सम्मान रखते हुए मेरा यह विश्वास है कि जब सारी उम्मीदें समाप्त होने लगती हैं, तो अवसाद और गहन निराशा की घडी में, अंतहीन सी लगने वाली अँधेरी सुरंग से गुजरते समय हमें साहित्य ही रौशनी की किरण बनकर संभालता है और यह विश्वास भी जगाता है कि सुरंग का रास्ता ख़त्म होने वाला है. जल्द ही सुखद जीवन की किरण दिखाई देने वाली है, बस चलते रहो .... जब भी ऐसे कठिन दौर आये मुझे खुमार बाराबंकवी के इस अशआर ने भी बड़ी ताकत दी है ..
न हारा है इश्क, न ज़माना अभी थका है
दीया जल रहा है, हवा चल रही है
शेष फिर....

Wednesday, 3 June 2020

एहसास की ज़ुबाँ है शायरी


विभाष कुमार झा 

 शायरी पर यूं तो तमाम शायरों  ने एक से बढ़कर अशआर लिखे हैं. फिर भी कुछ अशआर का ज़िक्र किये बिना ये बात तफ्सील से बताना नामुमकिन है.

बक़ौल निदा फाज़िली-
"मिल के जो खो गया है ज़िन्दगी में 
ग़ज़ल है नाम उसका  शायरी में"

जां निसार अख़्तर कहते हैं-
हमसे पूछो  ग़ज़ल क्या, ग़ज़ल का फ़न क्या 
चंद लफ़्ज़ों  में जैसे कोई आग छुपा दी जाये    
 
और ये शेर तो अक्सर दोहराया जाता है, ग़ज़ल की  खूबसूरती और नज़ाक़त को बयान करने के लिए
फ़िक़्र मोमिन की, जुबां दाग़ की, ग़ालिब का बयां 
मीर का  रंग-ए- सुख़न हो तो ग़ज़ल होती है 
सिर्फ़ अल्फ़ाज़ ही मानी नहीं करते पैदा
जज़्बा-ए-ख़िदमत-ए-फ़न  हो तो ग़ज़ल होती है.

इसी तरह  शायरी के मुताल्लिक़ भी बहुत उम्दा अशआर कहे गए हैं

शक़ील बदायूँनी कहते हैं -

मैं शक़ील दिल का हूं तर्जुमां, कि मुहब्बतों का हूँ राज़दां    
 मुझे फ़ख़्र है  मिरी शायरी,  मिरी ज़िन्दगी से जुदा नहीं 

 बकौल जां निसार अख़्तर  शायरी को यूं समझा जा सकता है -

मेरा हर शे'र है अख़्तर मेरी ज़िंदा  तस्वीर 
देखने वालों ने हर लफ्ज़ में देखा है मुझे
  
इस ब्लॉग में हम ऐसे ही उम्दा और बेहतरीन अशआर पेश करने की ख्वाहिश रखते हैं, जो शायरी में नई-नई दिलचस्पी रखने  वालों को भी पसंद आएं.    उम्मीद करते हैं की पाठक भी इसमें अपने सुहाव देते रहेंगे, ताकि उनके सुझाव के आधार पर भी इस ब्लॉग को पढ़ने योग्य बनाया जा सके.  



    

*कोरोना के दौर में पत्रकारिता -- खुद से कही गई कुछ बातें*

विभाष कुमार झा ––––––– *न जाने कौन सा पल मौत की अमानत हो, हर एक पल की ख़ुशी को गले लगा के जियो न मुंह छुपा के जीयो,और न सर झुका के जीयो ...